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जयगढ़, जालौर और जैसलमेर दुर्ग का इतिहास

1. जयगढ़ दुर्ग: इसे राजा मानसिंह (1589-1614) ने अपना खजाना छिपाने के लिए बनवाया था। पहले इसे "चिल्ह का टोला" कहते थे। मिर्जा राजा जयसिंह और सवाई जयसिंह ने इसका विस्तार किया। यहाँ विश्व की सबसे बड़ी तोप जयबाण रखी है और तोप बनाने का कारखाना भी है। 2. जालौर दुर्ग: यह सुवर्णगिरी पहाड़ी पर बना है। इसका निर्माण प्रतिहार नरेश नागभट्ट प्रथम ने करवाया था। अलाउद्दीन खिलजी ने 1308-1311 में यहाँ आक्रमण किया। यह अपनी विशाल बुर्जों के कारण बाहर से दिखाई नहीं देता। 3. जैसलमेर दुर्ग: 12 जुलाई 1155 को रावल जैसल ने इसकी नींव रखी। यह त्रिकूटाकृति का दुर्ग है जिसमें 99 बुर्जें हैं। यह पीले पत्थरों से बना है इसलिए स्वर्ण दुर्ग कहलाता है। दूर से देखने पर यह रेत में खड़े जहाज जैसा लगता है। यह राजस्थान का दूसरा सबसे बड़ा लिविंग फोर्ट है।

राजस्थान के प्रमुख दुर्ग - कुम्भलगढ़, चित्तौड़गढ़, गागरोण

1. कुम्भलगढ़ दुर्ग: इसका निर्माण महाराणा कुम्भा ने 1443-1458 के बीच मण्डन की देखरेख में करवाया। यह मेवाड़-मारवाड़ की सीमा पर है। यहाँ उदयसिंह का राज्याभिषेक और प्रताप का जन्म हुआ था। इसकी दीवार 36 किमी लंबी है, जिस पर 3-4 घुड़सवार एक साथ चल सकते हैं। 2. चित्तौड़गढ़ दुर्ग: इसका वास्तविक नाम चित्रकूट है। 7वीं शताब्दी में चित्रांगद मोरी ने बनवाया। यह 616 फीट ऊँचे पठार पर है और इसमें 7 दरवाजे हैं। यहाँ रानी पद्मिनी महल, विजय स्तम्भ, मीरा मंदिर स्थित हैं। 3. गागरोण दुर्ग: यह एक जलदुर्ग है जो अरावली की पहाड़ी पर कालीसिंध और आहू नदी के संगम पर है। इसका निर्माण डोड राजपूतों ने करवाया था। यह बिना नींव का किला कहलाता है। यहाँ संत पीपा की छतरी भी है।

राजस्थान के दुर्गों के प्रकार | Rajasthan ke Durg

शुक्र नीति में 9 प्रकार के दुर्ग बताए गए हैं। आचार्य कौटिल्य ने दुर्गों के 4 मुख्य प्रकार बताए हैं: औदक दुर्ग: जो पानी से घिरा हो। जैसे - गागरोण दुर्ग। पार्वत दुर्ग: पहाड़ी पर बना हुआ। जैसे - चित्तौड़, जालौर, रणथम्भौर, मेहरानगढ़। धान्वन दुर्ग: रेगिस्तान में बना। जैसे - जैसलमेर दुर्ग। वन दुर्ग: जंगल में बना। जैसे - सिवाणा दुर्ग। अन्य 2 प्रकार: स्थल दुर्ग (बीकानेर, नागौर) और मिट्टी के किले (भटनेर, भरतपुर लोहागढ़)।