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हल्दीघाटी युद्ध का इतिहास"

सोलहवीं शताब्दी का भारत एक विशाल मुगल साम्राज्य के सामने झुक रहा था, लेकिन मेवाड़ की पावन धरती पर एक ऐसा शूरवीर खड़ा था जिसके लिए स्वाभिमान से बड़ा कोई साम्राज्य नहीं था। महाराणा प्रताप के सामने दो स्पष्ट मार्ग थे—एक तरफ मुगल सम्राट अकबर की अधीनता स्वीकार कर महलों का ऐशो-आराम जीना, तो दूसरी तरफ अरावली की पथरीली पहाड़ियों में अनिश्चितता, संघर्ष और स्वतंत्रता की कठिन राह चुनना। प्रताप ने बिना किसी हिचकिचाहट के स्वतंत्रता का कांटों भरा रास्ता चुना। 1576 में लड़ा गया हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध केवल दो विशाल सेनाओं की भिड़ंत नहीं, बल्कि समर्पण और स्वाभिमान के बीच सिद्धांतों का टकराव था। युद्ध के पश्चात् महाराणा को अपनी सैन्य शक्ति पुनर्गठित करने के लिए अरावली के घने जंगलों को अपना ठिकाना बनाना पड़ा। महलों के रेशमी गद्दों की जगह गुफाओं की सख्त चट्टानों ने ले ली और छप्पन प्रकार के शाही व्यंजनों की जगह कंद-मूल ने। संघर्ष की यह घड़ी तब अपने चरम पर पहुँची जब राजपरिवार के पास अन्न का एक दाना तक न बचा और रानी को घास के बीजों की रोटियाँ बनानी पड़ीं। जब एक जंगली जानवर ने भूखे बच्चे के हाथ से घास क...