श्री रणछोड़ायजी का : यह प्रमुख वैष्णव तीर्थ एवं हिन्दुओं का पवित्र धाम है। खेड़ में भूरिया बाबा तथा खेड़िया बाबा रेबारियों के आराध्य देव हैं। खेड़ मंदिर,
मल्लीनाथ मंदिर : तिलवाड़ा में यह मंदिर मल्लीनाथ जी का समाधि स्थल है।
ब्रह्मा का मंदिर आसोतरा : आसोतरा, बाड़मेर में ब्रह्मा का मंदिर स्थित है। इस मंदिर की मूर्ति स्थापना 1984 ई. में की गई।
श्री नाकोड़ा : बालोतरा के पश्चिम में भाकरियाँ नामक पहाड़ी पर जैन मतावलम्बियों का प्रसिद्ध तीर्थ स्थान।
बाटाडू का कुआँ
: बाड़मेर के बाटाडू गाँव में रावल गुलाबसिंह द्वारा निर्मित्त संगमरमर का कुआँ, जिसे 'रेगिस्तान का जलमहल' कहा जाता है।
किराडू के मंदिर : बाड़मेर के हाथमा गाँव के निकट एक पहाड़ी के नीचे स्थित किराडू 10वीं व 11वीं शती के विष्णु व शिव मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। किराडू की स्थापत्य कला भारतीय नागर शैली की है। ये मंदिर 'राजस्थान का खजुराहो' के नाम से प्रसिद्ध हैं।
सिवाणा दुर्ग : पँवार शासक वीर नारायण द्वारा निर्मित्त।
किलोणगढ़ (बाड़मेर दुर्ग): सन् 1552 ई. में राव भीमोजी द्वारा निर्मित्त ।
सिवाणा दुर्ग
: वीर नारायण पंवार द्वारा दसवीं शताब्दी में निर्मित्त। प्रारंभ में इसका नाम कुम्थाना का किला था।
प्रथम शाकाः सोनगरा चौहान शासक वीर सातलदेव (कान्हडदेव का भतीजा), सोम और अलाउद्दीन खिलजी के मध्य 1308 ई. में युद्ध जिसमें अलाउद्दीन खिलजी ने वहाँ के प्रमुख पेयजल स्त्रोत मांडेलाव तालाब को गौमांस से दूषित कर दिया था। वीर सातल और सोम वीर गति को प्राप्त हुए। अलाउद्दीन ने इस दुर्ग का नाम खैराबाद रखा एवं कमालुद्दीन गुर्ग को दुर्ग रक्षक नियुक्त किया। द्वितीय शाकाः अकबर ने जोधपुर नरेश मोटाराजा उदयसिंह के नेतृत्व में सिवाणा के शासक वीरकल्ला रायमलोत पर आक्रमण किया। वीर कल्ला वीरगति को प्राप्त हुए और उनकी हाड़ी रानी ने दुर्ग की सभी स्त्रियों के साथ जौहर किया।
जूना बाड़मेर : मुनाबाव मार्ग पर बाड़मेर से 40 किमी. दूरी पर प्राचीन बाड़मेर शहर 'जूना बाड़मेर' के ध्वंशावशेष अभी भी मौजूद हैं।
उण्डुकासमेर
: बाड़मेर के शिव तहसील के इस गाँव में लोक देवता रामदेव का जन्म हुआ था।
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