महाराजा मानसिंह (आमेर) : -
मानसिंह का जन्म मौजमाबाद गाँव (जयपुर) में हुआ। उसने 26 वर्ष तक आमेर पर शासन किया था। मानसिंह, अकबर का विश्वासपात्र सेनापति भी था। राजा भारमल की पुत्री से विवाह करने के बाद अकबर, मानसिंह को अपने साथ ही आगरा ले गया। आगरा पहुँचने के बाद अकबर ने राजस्थान के सुदृढ़ तथा अजेय रणथम्भौर दुर्ग को जीतने का निश्चय किया। 21 दिसम्बर, 1568 को उसने ससैन्य आगरा से प्रस्थान किया। इसमें भगवंतदास एवं मानसिंह को भी साथ चलने का आदेश मिला। इस समयू रणथम्भौर का शासक सुर्जन हाड़ा था, जो बूँदी का शासक था। भगवंतदास ने सुर्जन हाड़ा को अकबर से मिलाया। इस प्रकार भगवंतदास ने सुर्जन हाड़ा को अकबर की अधीनता स्वीकार कराने में अपना योगदान देकर अकबर का विश्वास जीता। जुलाई, 1572 में अकबर के गुजरात अभियान में मानसिंह अकबर के साथ रहा। गुजरात में शेर खाँ फलौदी ने विद्रोह किया था। इस विद्रोह में मानसिंह ने जोरदार आक्रमण करके उसका माल असबाब लूट लिया एवं सम्राट अकबर के सामने पाटन में स्थापित शिविर में उपस्थित हुआ लेकिन, अकबर के गुजरात से जाते ही पुनः विद्रोह भड़क उठा जिसको दबाने के लिए भगवंतदास व मानसिंह को भेजा गया। इन्होंने आगे बढ़कर मिर्जा की सेना का सामना किया जिसमें इब्राहिम मिर्जा भाग खड़ा हुआ। गुजरात वापसी के दौरान अकबर ने मानसिंह को मुगल सेनानायकों के साथ डूंगरपुर अभियान करने का आदेश दिया। मानसिंह ने डूंगरपुर पर अप्रैल, 1573 को आक्रमण किया और डूंगरपुर पर अधिकार कर लिया। अकबर ने मानसिंह को डूंगरपुर अभियान पर भेजते समय कहा था कि वह महाराणा प्रताप (मेवाड़) से सम्पर्क स्थापित कर उसे मुगलों की अधीनता स्वीकार करने के लिए तैयार करे। अतः डूंगरपुर अभियान के बाद मानसिंह महाराणा प्रताप से मिलने उदयपुर गया। राणा प्रताप ने मानसिंह का आदर संत्कार तो किया, परन्तु अकबर की अधीनता मानने से इंकार कर दिया।
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