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प्रमोद बिश्नोई - 1857 की क्रांति से 1911 तक
1. 1857 की क्रांति के कारण
सहायक संधि की नीति: देशी राज्यों को अंग्रेजों की राजनीतिक परिधि में लाने के लिए गवर्नर जनरल लॉर्ड वैलेजली (1738-1805) द्वारा लाई गई। खर्च संबंधित राज्य को उठाना पड़ता था। राजस्थान में सर्वप्रथम भरतपुर ने 29 सितम्बर 1803 को संधि की। भारत में प्रथम सहायक संधि 1798 में हैदराबाद के निजाम से हुई।
तात्कालिक कारण: सेना में एनफील्ड राइफलों में चर्बी लगे कारतूसों के प्रयोग ने सैनिकों की धार्मिक भावनाओं को आहत किया। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का प्रारम्भ 10 मई, 1857 को मेरठ छावनी से हुआ।
देशी रियासतों ने अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में जंग लड़ने का फैसला किया। राजस्थान में 6 सैनिक छावनियाँ थीं - ब्यावर, नसीराबाद, नीमच, एरिनपुरा, देवली, खैरवाड़ा।
2. राजस्थान में 1857 के प्रमुख केन्द्र
नसीराबाद (28 मई 1857): 15वीं नेटिव इंफेन्ट्री के सैनिकों ने विद्रोह किया। अजमेर राजस्थान में ब्रिटिश सत्ता का प्रमुख केन्द्र था।
नीमच (3 जून 1857): हीरासिंह के नेतृत्व में विद्रोह। मेजर शावर्स ने मेवाड़ सेना की सहायता से खदेड़ा। महाराणा स्वरूप सिंह ने जगमंदिर में शरण दी।
एरिनपुरा (21 अगस्त 1857): पूर्बिया सैनिकों ने विद्रोह किया।
आउवा का विद्रोह: ठाकुर कुशालसिंह के नेतृत्व में। 8 सितम्बर 1857 को बिथौड़ा (पाली) में जोधपुर व कैप्टन हीथकोट की सेना को हराया। 18 सितम्बर 1857 को चेलावास में AGG पैट्रिक लॉरेन्स को भी हराया। मोकमसिंह मारा गया, मैकसन का सिर किले के दरवाजे पर लटकाया।
कोटा का विद्रोह (15 अक्टूबर 1857): मेहराब खां व जयदयाल ने किया। कोटा राजस्थान में क्रांति का सर्वप्रमुख केन्द्र था। सबसे शक्तिशाली व सबसे लम्बी अवधि तक चला। मेजर बर्टन व उसके दो पुत्रों को मारा। 1858 में रॉबर्ट्स ने दमन किया।
टोंक, धौलपुर, भरतपुर: टोंक में नासिर मोहम्मद ने नेतृत्व किया। धौलपुर में गुर्जर समाज के रामचंद्र व हीरालाल ने। भरतपुर में किसी किसान या राजा ने भाग नहीं लिया।
3. 1857 के बाद की घटनाएँ
राजस्थान में सर्वप्रथम मेवाड़ के महाराणा स्वरूप सिंह ने अंग्रेजों की सहायता की।
बीकानेर के राजा सरदार सिंह: 1857 में सेना लेकर बाडलू गाँव (हिसार) तक गया, बदले में 41 परगने मिले।
जयपुर के रामसिंह द्वितीय: तन-मन-धन से सहायता की, बदले में "सितार-ए-हिन्द" उपाधि व कोटपूतली परगना मिला।
आन प्रथा
अर्थ - महाराणा की सौगन्ध। मेवाड़ के व्यापारी लेन-देन में इसका प्रयोग करते थे। महाराणा ने इसे कानूनी मान्यता दे रखी थी, लेकिन 1863 में पुलिस अधिकारी निजामुद्दीन ने गैर-कानूनी घोषित कर दिया। 1864 में चम्पालाल के नेतृत्व में मेवाड़ में पहली बार आम हड़ताल हुई।
अजमेर दरबार (1870)
गवर्नर जनरल लॉर्ड मेयो था। 22 अक्टूबर 1870 को लगा। मेयो ने देशी शासकों, सामंतों व अंग्रेजों के बीच सांस्कृतिक खाई को पाटने के लिए मेयो कॉलेज खोलने की घोषणा की (1875 में स्थापित)। कोटा महाराव को 1857 में संदिग्ध भूमिका के कारण नहीं बुलाया गया। जोधपुर के महाराजा तख्तसिंह आये पर बिना शामिल हुए लौट गये।
कलकत्ता दरबार (दिसम्बर 1875)
प्रिंस अल्बर्ट के स्वागत के लिए। 1876 में प्रिंस अल्बर्ट जयपुर आये। इनके आगमन को चिर स्थायी बनाने के लिए सवाई रामसिंह द्वितीय ने अल्बर्ट हॉल की नींव डलवाई।
दिल्ली दरबार (1877)
1876 में महारानी विक्टोरिया ने कैसर-ए-हिन्द उपाधि धारण की, घोषणा के लिए 1877 में लॉर्ड लिटन ने दिल्ली दरबार किया। उस समय भारत अकाल ग्रस्त था, इसलिए देशी पत्रों में लिटन की तुलना रोम के नीरो से की गई। जयपुर के सवाई रामसिंह द्वितीय को साम्राज्ञी का सलाहकार नियुक्त किया गया।
दिल्ली दरबार (1911)
सम्राट जॉर्ज पंचम व महारानी मेरी के स्वागत के लिए। इसी अवसर पर कलकत्ता से दिल्ली राजधानी परिवर्तन की घोषणा हुई।
महाराजा गंगा सिंह (बीकानेर)
प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) में गंगा रिसाला (ऊँट की पलटन) व सार्दूल लाइट इन्फेंट्री के साथ अंग्रेजों की मदद को गये। पेरिस शांति सम्मेलन 1919 व राष्ट्र संघ के अधिवेशनों में भाग लिया। अलवर के जयसिंह व धौलपुर के उदयभान सिंह के साथ प्रथम गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया। 1931 में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के लिए लंदन गये तब चंदनमल बहड़ व स्वामी गोपाल दास ने उनके खिलाफ पर्चे बांटे, जिससे बीकानेर लौटकर उन पर राजद्रोह केस चलाया।
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